किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम् का अर्थ

(A) आचारों से पवित्र राजा दिलीप की सेवा में झरनों के कणों से सि​ञ्चित हवायें संलग्न थीं।
(B) कुटिल जनों के प्रति सरलता नीति नहीं होती।
(C) सुन्दर आकृतियों के लिए क्या वस्तु अलंकार नहीं होती है।
(D) इनमें से कोई नहीं

Answer : सुन्दर आकृतियों के लिए क्या वस्तु अलंकार नहीं होती है।
Explanation : संस्कृत सूक्ति 'किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम्' का हिंदी में अर्थ– सुन्दर आकृतियों के लिए क्या वस्तु अलंकार नहीं होती है। संस्कृत की यह सूक्ति अभिज्ञान शाकुन्तलम् 1/20 से ली गई है। State TET, CTET, TGT, PGT आदि परीक्षाओं के लिए कुछ अन्य महत्वपूर्ण संस्कृत सूक्तियां हिंदी में अर्थ सहित पढ़े–
आज्ञा गुरुणामविचारणीया। (रघुवंशम् 14/46)
हिंदी में अर्थ– बड़ों की आज्ञा विचारणीय नहीं होती।

आचारपूतं पवन: सिषेवे। (रघुवंशम् 02/13)
हिंदी में अर्थ– आचारों से पवित्र राजा दिलीप की सेवा में झरनों के कणों से सि​ञ्चित हवायें संलग्न थीं।

रिक्त: सर्वो भवति हि लघु: पूर्णता गौरवाय (मेघदूतम् 1/20)
हिंदी में अर्थ– वर्षा कर चुके खाली मेघ को यक्ष रेवा के जल को ग्रहण कर भारी होने को कहता है– 'क्योंकि सभी खाली (पदार्थ) हल्के होते हैं और भरा होना भारीपन का कारण होता है।'
Tags : संस्कृत, संस्कृत सूक्ति
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Web Title : Kimiv Hi Madhuranam Mandanam Nakratinam