न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्य का अर्थ

(A) वह ​नन्दिनी दिन और रात्रि के मध्य सन्ध्या के समान सुशोभित हुई।
(B) मूर्ख व्यक्ति भाग्य को ही प्रमाण मानते हैं।
(C) मनुष्य कभी धन से तृत्प नहीं हो सकता।
(D) इनमें से कोई नहीं

Answer : मनुष्य कभी धन से तृत्प नहीं हो सकता।
Explanation : संस्कृत सूक्ति 'न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्य' का हिंदी में अर्थ– मनुष्य कभी धन से तृत्प नहीं हो सकता। संस्कृत की यह सूक्ति कठोपनिषद् 1/1/27 से ली गई है। State TET, CTET, TGT, PGT आदि परीक्षाओं के लिए कुछ अन्य महत्वपूर्ण संस्कृत सूक्तियां हिंदी में अर्थ सहित पढ़े–
उत्तरावकाशम् अपहरन्तया कृंत वचसि कौशलम्। (कादंबरी/चंद्रापीडकथा)
हिंदी में अर्थ– चंद्रापीड मदलेखा से कहता है– तुम अपना मन्तव्य स्वीकार कराने की कला जानती हो। तुमने उत्तर का अवसर दिये बिना ही अपनी वाणी की कुशलता प्रकट कर दी है।

एको रस: करुण एव निमित्तभेदात्। (उत्तररामचरितम्)
हिंदी में अर्थ– एक करुण रस ही कारण भेद से भिन्न होकर अलग-अलग परिणामों को प्राप्त होता है।
Tags : संस्कृत, संस्कृत सूक्ति
Useful for : UPSC, State PSC, IBPS, SSC, Railway, NDA, Police Exams
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Web Title : Na Vitten Tarpaniyo Manushya